प्राचीन भारतीय लोक धर्म, कला और वास्तुकला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो हिंदू, बौद्ध और जैन परंपराओं में धन, उर्वरता और प्रकृति के संरक्षक के रूप में पूजे जाते हैं.
परिचय: यक्ष (नर) और यक्षिणी (मादा) को प्रकृति, जल, और धन-संपत्ति का देवता माना गया है। इन्हें शुरुआत में स्थानीय संरक्षक देवता के रूप में पूजा जाता था.
धार्मिक महत्व: बाद में इन्हें जैन धर्म (तीर्थंकरों के सेवक/रक्षक के रूप में), बौद्ध धर्म (स्तूपों के द्वारपाल और रक्षक) और हिंदू धर्म (कुबेर के अनुचर) के धार्मिक विधान में स्थान मिला.
शिल्प कला: मौर्य, शुंग और कुषाण काल में यक्ष-यक्षिणियों की विशाल पत्थर की मूर्तियां बनाई गईं। पटना के पास मिली दीदारगंज यक्षी (चमर-ग्राहिणी) मौर्यकालीन उत्कृष्ट मूर्तिकला का एक प्रसिद्ध उदाहरण है.
आधुनिक उदाहरण: नई दिल्ली में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की इमारत के प्रवेश द्वार पर स्थापित यक्ष और यक्षिणी की विशाल मूर्तियां वित्तीय स्थिरता और समृद्धि का प्रतीक हैं